वो थी ही नहीं…….!
वो थी ही नहीं…….! कैसे प्यार करता मैं उससे ? जब वो थी नहीं ! इस बात का एहसास मुझे उस खूबसूरत शाम के बाद हुआ …… याद ऐसे आती है
शनिवार शाम ४:३५ बजे
स्कूल लाइब्रेरी, व्हाईएमसीए
वो थी ही नहीं : पहला भाग
राजेश जोसेप एक चश्मिश , शर्मीला पतली कदकाठी का युवक जो की पढ़ाई में टॉपर लेकिन पॉपुलर नहीं था लड़कियों के बीच | स्कूल का आखिरी दिन था आज तो उसने सोचा था की उसकी तरह एक मात्र पढ़ाकू लड़की निधि को वह प्रोपोज़ करेगा | उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाएगा | वह उसे एक साल से चाहता था पर आज के दिन उसने इज़हार करने को सोची लेकिन इसके अरमानो को बहुत तेज़ ठेस पहुंचने वाली थी ….जैसे ही ख़ुशी के मारे क्लास में धाकिल होने को होता है ….धड़ाम ! उसकी आँखें विस्मय से होती हुई दुःख से भर जाती इसका सबब राजेश को भी नहीं होता …वह करता भी क्या? सामने उसने देखा पंकज क्लास का बैकबेंचर और सबसे लद्दड़ स्टूडेंट उसकी ही पसंद यानी क्रश को प्रोपोज़ कर रहा है और ताज्जुब से निधि भी हाँ कह देती है !
पर उसे क्या मालूम कि राजेश भी उसे चाहता था और आखिर निधि ने भी उसे दोस्त से ज्यादा कुछ समझा नहीं या वह राजेश के इज़हार का इंतज़ार कर रही थी या पंकज उसे ज़्यादा पसंद आ चुका था पर अब फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला इस बात से क्यूंकि तो राजेश टूट चुका था , अब रोने कि शुरुआत हो चुकी थी और भागे भागे किताबी कुमार लाइब्रेरी के मेज़ पर किताब के सहारे अपनी अश्रुओं को छिपाने कि भरपूर कोशिश कर रहा था |
तभी अचानक से टेबल पर हाथ पटकने की आवाज़ हुई …..किताब में आंसू लेकर घुसे राजेश को समझ में भी नहीं आया आखिर हो क्या रहा था | “हेलो मिस्टर ! किताब नहीं पढ़नी तो मुझे ही दे दो ” एक नई लड़की उसकी तरफ अकड़कर मुस्कुराते हुए बोली | हाँ मैं पढ़ ही रहा हूँ ! लीव मी अलोन ! रिलैक्स राजेश ! तुम कुछ परेशां दिख रहे हो …लगता है तुम्हारा दिल दुखा है !
उसने बड़े आराम से मानो सब जानते – बूझते कहा हो जिसके नतीजन राजेश उठ के खड़ा हो गया और पूछ ही बैठता है – कौन हो आप ? सब मुझे सृष्टि कहते हैं but यू कैन कॉल मी – श्रीश …..मैं बगल वाले सेक्शन की हूँ और हम शायद ही कभी मिले हैं पर हाँ मैं तुम्हारे बारे काफी कुछ जानती हो और चलो रोना बंद करो और बताओ व्हाई were यू क्राइंग ?
अब वह टच चला गया था

Web Journalist
Ex- Punjab Kesari, Bihar Express, Unacademy

