मुझे गांधी बिल्कुल नहीं पसंदOpinion Trending हिन्दी लेख 

मुझे गांधी बिल्कुल नहीं पसंद , जानना चाहोगे क्यों ?

मुझे गांधी बिल्कुल नहीं पसंद ,हो सकता है कि मेरी जानकारी कम हो,पर जितनी भी है वो बिल्कुल सटिक है,चाहे आप उसके लिये मुझे गाली ही क्यों न दो। ये पोस्ट मैं भगत सिंह के जयंती पे ही करना चाहता था पर कुछ जानकारी अधूरी जैसी लग रही थी,इसी वजह से आज लाल बहादुर शास्त्री के जयंती पे पोस्ट कर रहा हूँ। मुझे पता है कि गांधी वाली लाबी ठीक उसी तरह बड़ी है जैसे मोदी के अंधभक्त।

भगत सिंह की प्रेरणा थे वीर सावरकर और गांधी भगत सिंह की रिहाई न होने की सबसे बड़ी वजह! शायद इसी वजह से मैं गांधी को कुछ नही मानता और नाही उसके लिए कोई इज्जत है,अगर लाठी से ही आजादी मिली थी तो लोग मारे कैसे गए आजादी में, खैर गांधी के चाहने वालो की तादाद ठीक वैसे ही है जैसे की मोदी के अंधभक्त। हम बात कर रहे थे भगत सिंह के फाँसी की, जी हां, ये वही सच है जिसे नेहरू के इशारे पर तोड़ मरोड़ दिया गया। इसी इतिहास को तोड़ने की सुपारी दी गई वामपंथी टाइपिस्टों और नेहरू के ‘घरेलू’ व ‘दरबारी’ इतिहासकारों को। अभी कुछ दिन पहले ही भगत सिंह की जयंती थी। बहुत जरूरी है ऐसे मौकों पर इतिहास का सच जानना और इतिहास का बलात्कार करने वालों के चेहरे सामने लाना। पर उनके जयंती पे कुछ लिख नही पाया क्योंकि जानकारी अभी पूरी नही थी, खैर वीर सावरकर इस देश का गौरव हैं। उन जैसा देशभक्त शताब्दियों-शताब्दियों में पैदा होता है। पर हुआ यूं कि वामपंथियों ने भगत सिंह पर कब्जा कर लिया। उन्हें अपना माईबाप घोषित कर दिया।

मुझे गांधी बिल्कुल नही पसंद , वजहों की तो पेहरिस्त ही है इतनी लम्बी

 

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ये नेहरू काल था। इतिहास की कमान रोमिला थापर और इरफान हबीब जैसे वामपंथी टाइपिस्टों के हाथ थी। इन्हें इतिहास की ‘कांट्रैक्ट किलिंग’ का ठेका दिया गया था। कांट्रैक्ट दो थे। पहला भगत सिंह को जानबूझकर ‘न’ बचाने की कोशिश में गांधी के रोल को पर्दे से ढक देना। दूसरा भगत सिंह की असली प्रेरणा वीर सावरकर को गद्दार साबित कर रास्ते से हटा देना। वामपंथी लॉबी को इस काम के लिए नेहरू के दौर में मोटी घूस दी गई। मलाईदार पदों से नवाजा गया। उनके सतही, स्तरहीन ‘लुग्दी’ और ‘गल्प’ साहित्य को इतिहास का नाम देकर पुरूस्कृत किया गया। पर इतिहास तो कुछ और ही था।

हकीकत में खुदीराम बोस, मदन लाल ढींगरा, अनंत कन्हारे, बसंत विश्वास, भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव…ये सब वीर सावरकर के विचारों की आग में तपकर क्रांति की दुनिया में आए थे। भगत सिंह ने वीर सावरकर की बैन कर दी गई किताब भारत का स्वाधीनता संग्राम से प्रेरणा ली। उसे चोरी छिपे छपवाकर बांटा भी था। ये सब वे ऐतिहासिक सत्य हैं जिसे वामपंथी इतिहासकार मास्को से चाय की पत्ती मंगवाकर और नेहरू से केटली मांगकर खौलाकर पी गए थे। सावरकर को जब अंडमान की सेलुलर जेल से रिहाकर रत्नागिरी की जेल में भेजा गया, उस वक्त भगत सिंह और राजगुरू ने उनसे मुलाकात भी की। सुभाष चंद्र बोस की आईएनए के पीछे सावरकर की प्रेरणा थी। सुभाष बाबू खुद सावरकर के मुरीद थे। अब गांधी का सच भी जान लीजिए।

गांधी ने भगत सिंह को बचाने की एक भी कोशिश नही की। 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी हो गई। गांधी 24 मार्च को कांग्रेस के सालाना अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए कराची पहुंचे। यहां युवाओं ने जमकर उनके खिलाफ नारेबाजी की। उन्होंने भगत सिंह जिंदाबाद के नारे लगाए। यहां गांधी ने भगत सिंह की फांसी को लेकर वो बात कही जो मेरी नजर में इतिहास का सबसे काला अध्याय है। गांधी ने कहा–“किसी खूनी, चोर या डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के खिलाफ है।मैं भगत सिंह को नहीं बचाना चाहता था, ऐसा शक करने की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती”

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मुझे गांधी बिल्कुल नहीं पसंद अब सही काम नहीं किया तो कैसे करें पसंद ?

यानि वे भगत सिंह की तुलना खूनी, चोर या डाकू से कर रहे थे। अब खुद उनकी जुबानी जानिए कि उन्होंने भगत सिंह को बचाने के लिए क्या किया था। गांधी खुद यंग इंडिया में लिखते हैं कि उन्होंने 17 फरवरी, 1931 को वायसराय इरविन के साथ हुई बातचीत में भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए कोई जोर नही दिया- “हम समझौते के लिए इस बात की शर्त नहीं रख सकते थे कि अंग्रेजी हुकूमत भगत, राजगुरु और सुखदेव की सजा कम करे।” यही हुआ भी। गांधी की उस समय वायसराय इरविन के साथ गोलमेज पर निर्णायक बात चल रही थी। वे अगर चाहते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की रिहाई की शर्त जोड़कर भी बात कर सकते थे। पर भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी गांधी की नेहरू प्रिय सोच के खांचे में फिट नही होता था। सो गांधी ने ये नही किया।

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वीर सावरकर पर सवाल उठाने वाले “गद्दारों” को शायद मालूम न होगा कि वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का ‘स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा। दुनिया ने पहली बार जाना कि 1857 की लड़ाई देश का पहला स्वाधीनता संग्राम थी। वे दुनिया के इकलौते ऐसे लेखक थे जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश साम्राज्य की सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था। लंदन में किताब लिखकर उन्होंने नीदरलैंड, फ्रांस और जर्मनी से इसे छपवाया। वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था। सावरकर पर उंगली उठाने वाले नेहरू के दरबारी इतिहासकार खुद इस देश के इतिहास के गद्दार हैं।आप को बता दे की इसको जिस कलम से लिख रहा था वो कलम भी काली थी,उसी काली पेन के इंक से देश के ऐसे महान पुरुषों के मुँह पे मेरी तरफ से कालिख।

 

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार है. इनका हमारी वेबसाइट तथा संस्था से कोई सम्बन्ध नहीं है. )

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