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गांव से दिल्ली आया था नौकरी करने, इस तरह तय किया कांस्टेबल से IPS का सफर

जीवन में सफल होना कौन नहीं चाहता, ऐसा कौन इंसान होगा जो नहीं चाहता कि वह भी एक सरकारी नौकरी करें, बड़े पद पर आए और आईएएस, आईपीएस अफसर बने। विशेष रुप से यदि किसी गांव में अगर कोई लड़का या लड़की सरकारी नौकरी में आ जाता है तो उसे बहुत मान सम्मान मिलता है और उसकी एक अलग ही धाक समझाती है। आज हम आपको एक ऐसी ही पिछड़े हुए गांव के एक परिवार के बारे में बताने जा रहे हैं जहां एक किसान का बेटा अपनी मेहनत और लगन के दम पर IPS अफसर बना और ना सिर्फ अपने गांव का बल्कि पूरे राज्य का नाम रोशन किया।  तो आइए जानते हैं क्या है इस आईपीएस ऑफिसर विजय सिंह गुर्जर की कहानी।
राजस्थान के एक बेहद ही पिछड़े हुए गांव में किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले विजय सिंह गुर्जर का परिवार भी अन्य सामान्य परिवारों की तरह ही था। उनके पिता ने उन्हें यह सोचकर संस्कृत विषय से शास्त्री की पढ़ाई कराई ताकि विजय किसी सरकारी स्कूल या कॉलेज में टीचर बन जाए। मगर विजय को टीचर बनना गवारा नहीं था, उनके मन में कुछ और ही था और अपनी इसी इच्छा को लेकर वह दिल्ली आ गया जहां पर उन्होंने कॉन्स्टेबल भर्ती के लिए आवेदन कर रखा था।

कुछ इस तरह शुरू हुआ IPS बनने का सफ़र

मगर इसे किस्मत कहें या उनका यह हौसला था जो उन्होंने यहां पर कुछ ऐसा देखा कि सरकारी नौकरी करने आए विजय सिंह गुर्जर का मन कुछ यूँ बदला कि वह आईपीएस अफसर बनने की ललक लेकर उसकी तैयारी में जुट गए। पूरे 7 साल नौकरी करने के साथ-साथ पढ़ाई करने के बाद आखिरकार उन्होंने अपना मुकाम हासिल कर ही लिया। निश्चित रूप से उनकी यह कहानी हर युवा के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।
विजय सिंह गुर्जर से बातचीत में वह बताते हैं कि उन्होंने अपने गांव की सरकारी स्कूल से ही पढ़ाई की है, उनके पिता एक किसान हैं और मां घरेलू महिला थी। सभी पांच भाई-बहनों में विजय तीसरे नंबर पर थे और घर की पढ़ाई के साथ-साथ जानवरों की रखरखाव, खेती बाड़ी आदि में पिता की मदद भी करते थे। परिवार बड़ा था और जिम्मेदारियां भी मगर आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी नतीजन वह अच्छे कॉलेज में नहीं पढ़ सके। उनके पिता चाहते थे कि वह एक सरकारी टीचर बने जिसके लिए उनके पिता ने उन्हें संस्कृत से शास्त्री करने की सलाह दी थी। विजय बताते हैं कि उनके पिता का शिक्षा पर काफी जोर था, उन्होंने बहन को भी पढ़ाया है जो कि उस गांव के लिए एक मिसाल है क्योंकि वह उस गांव की पहली महिला ग्रेजुएट थी।

राह में आयीं बहुत सारी अड़चने

हालांकि गांव आदि में पढ़ाई का माहौल का ज्यादा नहीं रहता है और उनके भी गांव में कुछ ऐसे ही स्थिति थी मगर बावजूद इसके उनकी शिक्षक बनने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी। बाद में उनके किसी दोस्त से पता चला कि दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल की भर्ती निकली है और इसके बाद वह इस परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली ही आ गए। पेपर दिया 100 में से 89 नंबर भी आए तब उन्हें ऐसा लगा कि संस्कृत से पढ़ाई करने के बावजूद उन्होंने गणित तथा रिजनिंग में काफी अच्छा कर सकते है बाद में उनके मन में आया कि अब वह सब इंस्पेक्टर की भर्ती के लिए आवेदन करेंगे।
कांस्टेबल की परीक्षा में विजय सिंह पास हो चुके थे और जून 2010 में उन्हें कांस्टेबल के पद पर तैनाती भी मिल गई थी। कुछ समय बाद सब इंस्पेक्टर का परिणाम आया तो उसमें भी उन्हें सफलता मिली और उन्हें ऐसा लगा कि वह जिस मुकाम को सोच कर आए थे वह पूरा होता दिख रहा है। अपनी कांस्टेबल की ड्यूटी के दौरान उन्होंने दिल्ली मैं एक डीएसपी को देखा था और उनके काम और जिम्मेदारी को देखकर मन ही मन में जोश भर जाता था कि करो तो कुछ ऐसा ही करो। मगर मन में कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था कि नहीं हो पाया तो, इसके अलावा गांव के लोग तथा बच्चे भी यही सोचते थे कि मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं मेरे अंदर या क्षमता नहीं है। मगर इंटरनेट से उन्होंने कुछ मदद ली और देखा कि किस किस तरह से इसके लिए तैयारी की जा सकती है, उन्होंने दिल्ली में कुछ टॉपर से भी मदद और सलाह भी ली।
विजय सिंह के जोश, उम्मीद और उनकी दृढ़ शक्ति के आगे हर एक मुश्किलें कम लगतीं थी, इस दौरान उन्होंने एसएससी सीजीएल का भी पेपर दिया और कस्टम अफसर के तौर पर ज्वाइन किया था। बाद में उन्होंने वह जॉब छोड़ी और 2014 में इनकम टैक्स ऑफिसर बने। मगर उनके मन में सिर्फ एक ही इच्छा थी कि यूपीएससी क्रैक करना है और आईपीएस अफसर बनना है। 2013 उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा दी मगर प्रीलिम्स में भी नहीं हुआ, 2014 में फिर से दिया मगर उन्हें यह नहीं पता था कि बुक सिलेक्शन कैसे करना है और 2014 का अटेंड भी खराब हो गया। बाद में उन्होंने अपने कुछ साथियों से बात की और एक बार फिर से तैयारी में जुट गए और पिछली गलतियों को सुधारते हुए 2015 में लग कर सबसे पहले उन्हीं चीजों को तैयार किया और अपनी हद से ज्यादा मेहनत और लगन की बदौलत 2016 में उन्होंने आखिरकार मेंस निकाल लिया, मगर इंटरव्यू में 9 से 10 नंबर से पीछे रह गए।
आखिरकार साल 2018 में उन्होंने फिर से एक बार यूपीएससी की परीक्षा दी और इस बार उनकी मेहनत रंग लाई जिसमें उन्होंने 547 अंक प्राप्त कर आईपीएस पद हासिल कर लिया। जैसे ही यह सूचना उनके घर परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गयी। उनके इस हौसले से पूरे देश को ऐसे नौजवानों को प्रेरणा लेनी चाहिए और उनकी मेहनत हिम्मत और लगन की दाद देनी चाहिए। किस प्रकार गांव के एक लड़के ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत करते हुए दिल्ली आकर कांस्टेबल की नौकरी और एक-एक पायदान आईपीएस अधिकारी बन गया।

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