ओडिशा के पुरी में 208 किलो सोने से सजे भगवान जगन्नाथ, भक्तो ने किए दर्शन
रविवार के दिन ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के ‘सुना भेष’ (स्वर्ण परिधान) रूप में भक्त दर्शन करने के लिए भारी भीड़ मंदिर में पहुंचे। बता दें कि मौसी के घर से लौटे महाप्रभु जगन्नाथ, भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा ने रविवार के दिन सोना भेष में भक्तों को दर्शन दिया। यह वार्षिक रथ यात्रा के भव्य अनुष्ठानों में से एक है।
इस दिन होता है अनुष्ठान
बता दें कि अनुष्ठान वार्षिक रथ यात्रा की वापसी और भगवान के गुंडिचा मंदिर से लौटने के एक दिन बाद आषाढ़ एकादशी को होता है। वहीं, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ का रथ 12 वीं सदी में निर्मित मंदिर के सिहं द्वार पर खड़ा होता है और भगवान की आभा देखते ही बनती है क्योंकि उनके विग्रहों को 208 किलोग्राम के आभूषणों से सजाया जाता है। जिसमें भगवान बहुत ही सुंदर दिखते है।
इनके शासन में हुई शुरूआत
जानकारी के अनुसार ‘सुनाभेष’ अनुष्ठान की शुरुआत शासक कपिलेंद्र देब के शासन में सन् 1460 में तब शुरू हुई जब वह दक्कन विजय कर 16 बैलगाड़ियों में भर कर सोना लेकर पुरी पहुंचे। देब ने सोने और हीरे भगवान जगन्नाथ को अर्पित किए और पुजारियों से उनके गहने बनवाने के निर्देश दिए जिन्हें विग्रहों को पहनाया जाता है। जहां सुना भेष के लिए करीब 208 किलोग्राम स्वर्ण आभूषणों का इस्तेमाल होता है।
इन गहनों का होता है इस्तेमाल
जिसके लिए पुजारियों को भगवान को इस स्वर्ण आभूषणों का श्रृंगार करने में करीब एक घंटा लग जाता है। वहीं, भगवान को सजाने में जिन गहनों का इस्तेमाल होता है वह है ‘श्री हस्त’, ‘श्री पैर’ ,’श्री मुकुट’ और ‘श्री चौलपटी’ शामिल हैं। हालांकि, भगवान के ‘सुना भेष’ में हीरे का प्रयोग नहीं किया जाता। इन गहनों को मंदिर के ‘रत्न भंडार’ में ही रखा जाता है।
खास बात
मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ मौसी के घर से लौटने के बाद शयन पर जाने से पहले महाराजा का वेश धारण करते हैं और श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। वहीं, देश में कोरोना महामारी के चलते भक्त इसका हिस्सा नहीं बन पा रहे थे। क्या आपको ये पता है कि जगन्नाथ स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं।
साल में एक बार होती है रथयात्रा
जगन्नाथ जी की पूजा-अर्चना वैसे ही की जाती है, जैसे एक साधारण मनुष्य का दैनिक कार्य होता है। जैसे एक साधारण मनुष्य सवेरे उठ कर दांत साफ करता है, स्नान करता है, सुबह का नाश्ता, दोपहर एवं रात्रि का भोजन करता है, वैसे ही भगवान श्री जगन्नाथ भी करते हैं। वर्ष में एक बार श्री जगन्नाथ अपने साथ बलभद्र और सुभद्रा को लेकर रथयात्रा करने जाते है।

